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सिक्‍का बदल गया

खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूरदूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे औरश्रीराम, श्रीरामकरती पानी में हो ली। अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनीदी आंखों पर छींटे दिये और पानी से लिपट गयी!

चनाब का पानी आज भी पहलेसा ही सर्द था, लहरें लहरों को चूम रही थीं। वह दूर सामने काश्मीर की पहाड़ियों से बर्फ पिघल रही थी। उछलउछल आते पानी के भंवरों से टकराकर कगारे गिर रहे थे लेकिन दूरदूर तक बिछी रेत आज जाने क्यों खामोश लगती थी! शाहनी ने कपड़े पहने, इधरउधर देखा, कहीं किसी की परछाई तक थी। पर नीचे रेत में अनगिनत पांवों के निशान थे। वह कुछ सहमसी उठी!

आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में जाने क्यों कुछ भयावनासा लग रहा है। वह पिछले पचास वर्षों से यहां नहाती रही है। कितना लम्बा अरसा है! शाहनी सोचती है, एक दिन इसी दुनिया के किनारे वह दुल्हन बनकर उतरी थी। और आजआज शाहजी नहीं, उसका वह पढ़ालिखा लड़का नहीं, आज वह अकेली है, शाहजी की लम्बीचौड़ी हवेली में अकेली है। पर नहीं, यह क्या सोच रही है वह सवेरेसवेरे! अभी भी दुनियादारी से मन नहीं फिरा उसका! शाहनी ने लम्बी सांस ली औरश्री राम, श्री राम’, करती बाजरे के खेतों से होती घर की राह ली। कहींकहीं लिपेपुते आंगनों पर से धुआं उठ रहा था। टनटन, बैलों की घंटियां बज उठती हैं। फिर भीफिर भी कुछ बंधाबंधासा लग रहा है।जम्मीवालाकुआं भी आज नहीं चल रहा। ये शाहजी की ही असामियां हैं। शाहनी ने नजर उठायी। यह मीलों फैले खेत अपने ही हैं। भरीभरायी नई फसल को देखकर शाहनी किसी अपनत्व के मोह में भीग गयी। यह सब शाहजी की बरकतें हैं। दूरदूर गांवों तक फैली हुई जमीनें, जमीनों में कुएं सब अपने हैं। साल में तीन फसल, जमीन तो सोना उगलती है। शाहनी कुएं की ओर बढ़ी, आवाज दी, ”शेरे, शेरे, हसैना हसैना

शेरा शाहनी का स्वर पहचानता है। वह पहचानेगा! अपनी मां जैना के मरने के बाद वह शाहनी के पास ही पलकर बड़ा हुआ। उसने पास पड़ा गंडासाशटालेके ढेर के नीचे सरका दिया। हाथ में हुक्का पकड़कर बोला हैसैनासैनाशाहनी की आवांज उसे कैसे हिला गयी है! अभी तो वह सोच रहा था कि उस शाहनी की ऊंची हवेली की अंधेरी कोठरी में पड़ी सोनेचांदी की सन्दूकचियां उठाकरकि तभीशेरे शेरे शेरा गुस्से से भर गया। किस पर निकाले अपना क्रोध? शाहनी पर! चीखकर बोला मर गयीं एं एब्ब तैनू मौत दे

हसैना आटेवाली कनाली एक ओर रख, जल्दीजल्दी बाहर निकल आयी। आयीं आं क्यों छावेले (सुबहसुबह) तड़पना एं?”

अब तक शाहनी नजदीक पहुंच चुकी थी। शेरे की तेजी सुन चुकी थी। प्यार से बोली, ”हसैना, यह वक्त लड़ने का है? वह पागल है तो तू ही जिगरा कर लिया कर।

जिगरा !” हसैना ने मान भरे स्वर में कहाशाहनी, लड़का आखिर लड़का ही है। कभी शेरे से भी पूछा है कि मुंह अंधेरे ही क्यों गालियां बरसाई हैं इसने?” शाहनी ने लाड़ से हसैना की पीठ पर हाथ फेरा, हंसकर बोलीपगली मुझे तो लड़के से बहू प्यारी है! शेरे

हां शाहनी!”

मालूम होता है, रात को कुल्लूवाल के लोग आये हैं यहां?” शाहनी ने गम्भीर स्वर में कहा।

शेरे ने जरा रुककर, घबराकर कहा, ”नहीं शाहनी…” शेरे के उत्तर की अनसुनी कर शाहनी जरा चिन्तित स्वर से बोली, ”जो कुछ भी हो रहा है, अच्छा नहीं। शेरे, आज शाहजी होते तो शायद कुछ बीचबचाव करते। पर…” शाहनी कहतेकहते रुक गयी। आज क्या हो रहा है। शाहनी को लगा जैसे जी भरभर रहा है। शाहजी को बिछुड़े कई साल बीत गये, परपर आज कुछ पिघल रहा है शायद, पिछली स्मृतियांआंसुओं को रोकने के प्रयत्न में उसने हसैना की ओर देखा और हल्केसे हंस पड़ी। और शेरा सोच ही रहा है, क्या कह रही है शाहनी आज! आज शाहनी क्या, कोई भी कुछ नहीं कर सकता। यह होके रहेगा क्यों हो? हमारे ही भाईबन्दों से सूद लेलेकर शाहजी सोने की बोरियां तोला करते थे। प्रतिहिंसा की आग शेरे की आंखों में उतर आयी। गंड़ासे की याद हो आयी। शाहनी की ओर देखा नहींनहीं, शेरा इन पिछले दिनों में तीसचालीस कत्ल कर चुका है पर वह ऐसा नीच नहींसामने बैठी शाहनी नहीं, शाहनी के हाथ उसकी आंखों में तैर गये। वह सर्दियों की रातें कभीकभी शाहजी की डांट खाके वह हवेली में पड़ा रहता था। और फिर लालटेन की रोशनी में वह देखता है, शाहनी के ममता भरे हाथ दूध का कटोरा थामे हुएशेरेशेरे, उठ, पी ले।शेरे ने शाहनी के झुर्रियां पड़े मुंह की ओर देखा तो शाहनी धीरे से मुस्करा रही थी। शेरा विचलित हो गया।आंखिर शाहनी ने क्या बिगाड़ा है हमारा? शाहजी की बात शाहजी के साथ गयी, वह शाहनी को जरूर बचाएगा।लेकिन कल रात वाला मशवरा! वह कैसे मान गया था फिरोंज की बात! ‘सब कुछ ठीक हो जाएगा सामान बांट लिया जाएगा!’

शाहनी चलो तुम्हें घर तक छोड़ आऊं!”

शाहनी उठ खड़ी हुई। किसी गहरी सोच में चलती हुई शाहनी के पीछेपीछे मजबूत कदम उठाता शेरा चल रहा है। शंकितसा इधरउधर देखता जा रहा है। अपने साथियों की बातें उसके कानों में गूंज रही हैं। पर क्या होगा शाहनी को मारकर?

शाहनी!”

हां शेरे।

शेरा चाहता है कि सिर पर आने वाले खतरे की बात कुछ तो शाहनी को बता दे, मगर वह कैसे कहे?”

शाहनी

शाहनी ने सिर ऊंचा किया। आसमान धुएं से भर गया था।शेरे

शेरा जानता है यह आग है। जबलपुर में आज आग लगनी थी लग गयी! शाहनी कुछ कह सकी। उसके नाते रिश्ते सब वहीं हैं

हवेली गयी। शाहनी ने शून्य मन से डयोढ़ी में कदम रक्खा। शेरा कब लौट गया उसे कुछ पता नहीं। दुर्बलसी देह और अकेली, बिना किसी सहारे के! जाने कब तक वहीं पड़ी रही शाहनी। दुपहर आयी और चली गयी। हवेली खुली पड़ी है। आज शाहनी नहीं उठ पा रही। जैसे उसका अधिकार आज स्वयं ही उससे छूट रहा है! शाहजी के घर की मालकिनलेकिन नहीं, आज मोह नहीं हट रहा। मानो पत्थर हो गयी हो। पड़ेपड़े सांझ हो गयी, पर उठने की बात फिर भी नहीं सोच पा रही। अचानक रसूली की आवांज सुनकर चौंक उठी।

शाहनीशाहनी, सुनो ट्रकें आती हैं लेने?”

ट्रके…?” शााहनी इसके सिवाय और कुछ कह सकी। हाथों ने एकदूसरे को थाम लिया। बात की बात में खबर गांव भर में फैल गयी। बीबी ने अपने विकृत कण्ठ से कहाशाहनी, आज तक कभी ऐसा हुआ, कभी सुना। गजब हो गया, अंधेर पड़ गया।

शाहनी मूर्तिवत् वहीं खड़ी रही। नवाब बीबी ने स्नेहसनी उदासी से कहाशाहनी, हमने तो कभी सोचा था!”

शाहनी क्या कहे कि उसी ने ऐसा सोचा था। नीचे से पटवारी बेगू और जैलदार की बातचीत सुनाई दी। शाहनी समझी कि वक्त आन पहुंचा। मशीन की तरह नीचे उतरी, पर डयोढ़ी लांघ सकी। किसी गहरी, बहुत गहरी आवांज से पूछाकौन? कौन हैं वहां?”

कौन नहीं है आज वहां? सारा गांव है, जो उसके इशारे पर नाचता था कभी। उसकी असामियां हैं जिन्हें उसने अपने नातेरिश्तों से कभी कम नहीं समझा। लेकिन नहीं, आज उसका कोई नहीं, आज वह अकेली है! यह भीड़ की भीड़, उनमें कुल्लूवाल के जाट। वह क्या सुबह ही समझ गयी थी?

बेगू पटवारी और मसीत के मुल्ला इस्माइल ने जाने क्या सोचा। शाहनी के निकट खड़े हुए। बेगू आज शाहनी की ओर देख नहीं पा रहा। धीरे से जरा गला सांफ करते हुए कहाशाहनी, रब्ब नू एही मंजूर सी’’

शाहनी के कदम डोल गये। चक्कर आया और दीवार के साथ लग गयी। इसी दिन के लिए छोड़ गये थे शाहजी उसे? बेजानसी शाहनी की ओर देखकर बेगू सोच रहा हैक्या गुंजर रही है शाहनी पर! मगर क्या हो सकता है! सिक्का बदल गया है…’

शाहनी का घर से निकलना छोटीसी बात नहीं। गाँव का गाँव खड़ा है हवेली के दरवाजे से लेकर उस दारे तक जिसे शाहजी ने अपने पुत्र की शादी में बनवा दिया था। तब से लेकर आज तक सब फैसले, सब मशविरे यहीं होते रहे हैं। इस बड़ी हवेली को लूट लेने की बात भी यहीं सोची गयी थी! यह नहीं कि शाहनी कुछ जानती हो। वह जानकर भी अनजान बनी रही। उसने कभी बैर नहीं जाना। किसी का बुरा नहीं किया। लेकिन बूढ़ी शाहनी यह नहीं जानती कि सिक्का बदल गया है

देर हो रही थी। थानेदार दाऊद खां जरा अकड़कर आगे आया और डयोढ़ी पर खड़ी जड़ निर्जीव छाया को देखकर ठिठक गया! वही शाहनी है जिसके शाहजी उसके लिए दरिया के किनारे खेमे लगवा दिया करते थे। यह तो वही शाहनी है जिसने उसकी मंगेतर को सोने के कनफूल दिये थे मुंह दिखाई में। अभी उसी दिन जब वहलीगके सिलसिले में आया था तो उसने उद्दंडता से कहा थाशाहनी, भागोवाल मसीत बनेगी, तीन सौ रुपया देना पड़ेगा!’ शाहनी ने अपने उसी सरल स्वभाव से तीन सौ रुपये दिये थे। और आज…?

शाहनी!” डयोढ़ी के निकट जाकर बोलादेर हो रही है शाहनी। (धीरे से) कुछ साथ रखना हो तो रख लो। कुछ साथ बांध लिया है? सोनाचांदी

शाहनी अस्फुट स्वर से बोलीसोनाचांदी!” जरा ठहरकर सादगी से कहासोनाचांदी! बच्चा वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एकएक जमीन में बिछा है।

दाऊद खां लज्जितसा हो गया।शाहनी तुम अकेली हो, अपने पास कुछ होना जरूरी है। कुछ नकदी ही रख लो। वक्त का कुछ पता नहीं

वक्त?” शाहनी अपनी गीली आंखों से हंस पड़ी।दाऊद खां, इससे अच्छा वक्त देखने के लिए क्या मैं जिन्दा रहूंगी!” किसी गहरी वेदना और तिरस्कार से कह दिया शाहनी ने।

दाऊद खां निरुत्तर है। साहस कर बोलाशाहनी कुछ नकदी जरूरी है।

नहीं बच्चा मुझे इस घर सेशाहनी का गला रुंध गयानकदी प्यारी नहीं। यहां की नकदी यहीं रहेगी।

शेरा आन खड़ा गुजरा कि हो ना हो कुछ मार रहा है शाहनी से।खां साहिब देर हो रही है

शाहनी चौंक पड़ी। देर मेरे घर में मुझे देर ! आंसुओं की भँवर में जाने कहाँ से विद्रोह उमड़ पड़ा। मैं पुरखों के इस बड़े घर की रानी और यह मेरे ही अन्न पर पले हुएनहीं, यह सब कुछ नहीं। ठीक है देर हो रही है पर नहीं, शाहनी रोरोकर नहीं, शान से निकलेगी इस पुरखों के घर से, मान से लाँघेगी यह देहरी, जिस पर एक दिन वह रानी बनकर खड़ी हुई थी। अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालकर शाहनी ने दुपट्टे से आंखें पोछीं और डयोढ़ी से बाहर हो गयी। बडीबूढ़ियाँ रो पड़ीं। किसकी तुलना हो सकती थी इसके साथ! खुदा ने सब कुछ दिया था, मगर दिन बदले, वक्त बदले

शाहनी ने दुपट्टे से सिर ढाँपकर अपनी धुंधली आंखों में से हवेली को अन्तिम बार देखा। शाहजी के मरने के बाद भी जिस कुल की अमानत को उसने सहेजकर रखा आज वह उसे धोखा दे गयी। शाहनी ने दोनों हाथ जोड़ लिए यही अन्तिम दर्शन था, यही अन्तिम प्रणाम था। शाहनी की आंखें फिर कभी इस ऊंची हवेली को देखी पाएंगी। प्यार ने जोर मारा सोचा, एक बार घूमफिर कर पूरा घर क्यों देख आयी मैं? जी छोटा हो रहा है, पर जिनके सामने हमेशा बड़ी बनी रही है उनके सामने वह छोटी होगी। इतना ही ठीक है। बस हो चुका। सिर झुकाया। डयोढ़ी के आगे कुलवधू की आंखों से निकलकर कुछ बन्दें चू पड़ीं। शाहनी चल दी ऊंचासा भवन पीछे खड़ा रह गया। दाऊद खां, शेरा, पटवारी, जैलदार और छोटेबड़े, बच्चे, बूढ़ेमर्द औरतें सब पीछेपीछे।

ट्रकें अब तक भर चुकी थीं। शाहनी अपने को खींच रही थी। गांववालों के गलों में जैसे धुंआ उठ रहा है। शेरे, खूनी शेरे का दिल टूट रहा है। दाऊद खां ने आगे बढ़कर ट्रक का दरवांजा खोला। शाहनी बढ़ी। इस्माइल ने आगे बढ़कर भारी आवाज से कहाशाहनी, कुछ कह जाओ। तुम्हारे मुंह से निकली असीस झूठ नहीं हो सकती!” और अपने साफे से आंखों का पानी पोछ लिया। शाहनी ने उठती हुई हिचकी को रोककर रुंधेरुंधे से कहा, ”रब्ब तुहानू सलामत रक्खे बच्चा, खुशियां बक्शे

वह छोटासा जनसमूह रो दिया। जरा भी दिल में मैल नहीं शाहनी के। और हम, हम शाहनी को नहीं रख सके। शेरे ने बढ़कर शाहनी के पांव छुए, ”शाहनी कोई कुछ कर नहीं सका। राज भी पलट गयाशाहनी ने कांपता हुआ हाथ शेरे के सिर पर रक्खा और रुकरुककर कहातैनू भाग जगण चन्ना!” ( चा/ तेरे भाग्य जागें) दाऊद खां ने हाथ का संकेत किया। कुछ बड़ीबूढ़ियां शाहनी के गले लगीं और ट्रक चल पड़ी।

अन्नजल उठ गया। वह हवेली, नई बैठक, ऊंचा चौबारा, बड़ापसारएकएक करके घूम रहे हैं शाहनी की आंखों में! कुछ पता नहींट्रक चल दिया है या वह स्वयं चल रही है। आंखें बरस रही हैं। दाऊद खां विचलित होकर देख रहा है इस बूढ़ी शाहनी को। कहां जाएगी अब वह?

शाहनी मन में मैल लाना। कुछ कर सकते तो उठा रखते! वक़्त ही ऐसा है। राज पलट गया है, सिक्का बदल गया है…”

रात को शाहनी जब कैंप में पहुंचकर जमीन पर पड़ी तो लेटेलेटे आहत मन से सोचाराज पलट गया हैसिक्का क्या बदलेगा? वह तो मैं वहीं छोड़ आयी।…’

और शाहजी की शाहनी की आंखें और भी गीली हो गयीं!

आसपास के हरेहरे खेतों से घिरे गांवों में रात खून बरसा रही थी।

शायद राज पलटा भी खा रहा था और सिक्का बदल रहा था..

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