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मज़बूत सरकार-2

केंद्र के बाद उत्तर प्रदेश में भी प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा की सरकार ने पद भार ग्रहण किया। मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने के बाद आदित्यनाथ ने कहा- वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं को आगे बढ़ाएंगे। वादे के अनुसार सहारनपुर से गोरखपुर तक आगे बढ़ा भी रहे हैं। क्या यही वादा था नरेंद्र मोदी का?

केंद्र सरकार के नक्शे-कदम पर चलने के आदित्यनाथ के वादे के आधार पर मेरा अनुमान था कि यूपी पुलिस भी उसी रास्ते पर चलेगी। केंद्र से लेकर प्रदेश तक ‘जनादेश का अपमान’ देख पुलिस को आराम ही आराम होगा। सभी रेल दुर्घटनाओं में आतंकियों का हाथ होने की सम्भावना देख, पुलिस बड़े मजे में रहेगी। वे स्थानीय मीडियाकर्मी जो समय-समय पर जिला या थाना क्षेत्र में हुई बलात्कार, हत्या, लूट, छिनैती आदि की घटनाओं का फालोअप देते रहते हैं, उन मीडियाकर्मियों की घिग्घी बाँधने के लिए पुलिस भी जनादेश के अपमान का प्रयोग कर सकती है। थाना क्षेत्र में छिनैती की घटना हुई, तब पुलिस बताएगी- इस छिनैती में आतंकवादियों का हाथ हो सकता है। इसकी सूचना एटीएस को दे दी गई है। एटीएस की जाँच के बाद ही कुछ बताया जा सकता है। कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने के दबाव में अगर मुख्यमंत्री, डीजीपी से प्रश्न पूछेंगे, तब डीजीपी कह देंगे- ये जनादेश का अपमान है। डीजीपी का जवाब सुन मुख्यमंत्री की घिग्घी बँध जाएगी।

ऐसे सभी अनुमानों को आदित्यनाथ ने ध्वस्त कर दिया। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं को आगे बढ़ाने की बात कही थी। इस अनुसार मुझे लगा आदित्यनाथ भी विपक्ष की घिग्घी बाँधने के लिए केंद्र के चार वाक्यों का सहारा लेंगे। वे चारों वाक्य प्रदेश की भाजपा सरकार भी चलाएंगे। पर आदित्यनाथ की कार्यप्रणाली ने मुझे गलत साबित कर दिया। आदित्यनाथ की भाजपा सरकार ने ‘सरकार बदल गई है’ को अपना तकिया कलाम बनाया। इस संकटमोचक वाक्य का जाप सुन विपक्ष के साथ प्रदेश की घिग्घी बँधी हुई है- पता नहीं कब आदित्यनाथ ठोक दें। अपराध के ग्राफ का हौंसला बुलंद है। अपनी कार्यप्रणाली सबसे अलग दिखाने के लिए तकिया बदल दिया है, पर शायद मनबढ़ों और अपराधियों को ‘सरकार बदल गई है’ के प्रकोप से बचाने वाली केंद्रीय जीरो टॉलरेंस नीति आदित्यनाथ ने बता दी है। गाँव-देहात, कस्बा-मोहल्ला में जीरो टॉलरेंस नीति प्राचीन काल से चली आ रही है। मैं भी इसका प्रयोग करता हूँ।

गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में मनोहर पर्रिकर ने कहा- गोवा में बीफ की कमी नहीं होने दूँगा। गाय को माता मानने वाले दल के एक सिपाही का ये बयान फैला, तब गाँव में औरतों के बीच भी चर्चा शुरू हुई- ई कुल दू मूँहे वाला हउवन का। कब्भो राम के नाम वोट लेलन, कब्भो गंगा अ कब्भो गाय के नाम पर।  औरतों के बीच एक नइकी भउजी भी थी। वो समझाने लगी- बीफ का अर्थ सिर्फ गाय का माँस नहीं होता है। भउजी सही जानकारी दे रही थी। मैंने पूछा- कब से भउजी? भउजी ने फिर सही जानकारी दी- मनोहर पर्रिकर के बयान के बाद से।

मनोहर पर्रीकर द्वारा बीफ पर दिये गए बयान से विश्व हिंदू परिषद नाराज हुआ। उसने मनोहर पर्रीकर के इस्तीफे की माँग की। विहिप की माँग सुन बाऊ बहुत हँसे। काहें? बतावत हई।

मनोहर पर्रिकर का बयान सुन बीफ खाने वाले खुश। विश्व हिंदू परिषद की माँग सुन हिंदुत्व के सिपाही खुश। (खुश से सरलीकरण का खतरा है। सही शब्द तुष्टिकरण है।) ‘दोनों’ को खुश करने की नूरा कुश्ती गाँव में अक्सर होती है। मान लीजिए मनबढ़ई में मैंने किसी को गरिया दिया। ओरहन मेरे घर आया। ओरहन देने वाले के सामने बाऊ मुझे गरिया दिए। ओरहन देवे वाला खुश- सारे के गारी पड़ल। डाँट-डपट सुन बाऊ से नाराज हो जाऊँ, उसके पहले ही वे टुईं से आँख मार दिए। मैं समझ गया- बाऊ राजनीति खेल गए। बाऊ के प्रति मेरी सम्भावित नाराजगी असम्भव हो गई।

विकास की बाढ़ में आई उन्माद और हिंसा की लहर को जब जिंदगियाँ लीलने की लत पड़ गई, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- अस्सी प्रतिशत गौरक्षक, गोरखधंधे में लिप्त हैं। इन पर रोक लगनी चाहिए। मुझे मार लो, मेरे दलित भाइयों को मत मारो।

एक बार फिर मान लीजिए, मैंने जिसको गरियाया था, किसी दिन उसी से बात बढ़ गई। हूरा-फाइटिंग की नौबत आ गई। समय की कृपा से उस दिन मेरे साथ मेरा एक संही भी था। उस दिन मेरा संहियवा राजनीति खेल गया। मेरी मनबढ़ई को पकड़ने की जगह वो पिटने वाले को पकड़ लिया। उसकी पकड़ से मुझे मौका मिला। पिटने वाले की पलई में दू-चार हूरा और रख दिया। तब तक अन्य लोग भी ता-ता थम्मा करते हुए दौड़े और मुझे भी पकड़ लिया। संहियवा की राजनीति के सहारे मैं मार खाने से भी बच गया और पिटने वाले को और पीट भी दिया। 

फिर ओरहन घर आया। बाऊ फिर मुझे गरिया दिए। गरियाने के बाद फिर टुईं से आँख मार दिए- हमरे जीरो टॉलरेंस नीति क बुरा मत मनिहे बच्ची।

जीरो टॉलरेंस पार्टी के मोहल्ला प्रभारी मेरे घर के सामने वाले घर में रहते हैं। रात को बिजली कटती है, तब वे अपनी बालकनी में आते हैं। मोबाइल का स्पीकर ऑन कर विद्युत उपकेंद्र का नम्बर मिलाते हैं.

-बिजली क्यों गई?

-जम्फर उड़ गया है।

-कब तक ठीक होगा?

-आधा घंटा लगेगा।

-आधे घंटे में ठीक हो जाना चाहिए। सरकार बदल गई है।

बालकनी में बैठ पसीना-पसीना होते हुए, मच्छरों को पट्ट-पट्ट मारते हुए आधे घंटे इंतजार करते हैं। उनको पसीना छोड़ते हुए और मच्छर मारते हुए देखता हूँ, तो सोचता हूँ- इनके पास इन्वर्टर भी है। पंखे की हवा लेते हुए इंतजार करने में क्या हर्ज है?

आधे घंटे इंतजार के बाद उन्होंने फोन किया। स्पीकर भी ऑन किया।

-अभी तक जम्फर नहीं बदला ?

-आधा घंटा और लगेगा। दो ही कर्मचारी हैं। समय तो लगेगा ही।

-सरकार बदल गई है। अपनी कार्यप्रणाली सुधार लो। प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं। मुख्यमंत्री तड़के चार बजे उठ जाते हैं और देर रात तक काम करते हैं। तुम एक मामूली सा काम नहीं कर सकते। सुधर जाओ। सरकार बदल गई है।

-उतनी बड़ी और वजनी सीढ़ी साइकिल से लेकर चलनी पड़ती है। समय थोड़ा आगे-पीछे होगा ही।

-जबान लड़ाते हो। अभी तुम्हारे साहब से शिकायत करता हूँ। इतनी दूर फेकवाऊँगा कि घर आने का सपना देखोगे।

-ठीक है। आपको जो करना है करिए।

कर्मचारी के सब्र का बाँध जवाब दे गया।

कर्मचारी की शिकायत के लिए उन्होंने साहब को फोन मिलाया। साष्टांग प्रणाम किया। मौसी और बच्चों का हाल-चाल लिया। मधुर वाणी में बिजली कटने के बारे में बताया। नमकीन वाणी में कर्मचारी की शिकायत की। उधर से जो भी आश्वासन मिला, वो सुन नहीं पाया। स्पीकर ऑन नहीं था।
एक दिन कर्मचारी घर के सामने वाले खम्भे पर खट-खुट कर रहा था। मैंने उससे पूछा- अमुक का बिजली विभाग में बड़ा रुतबा है। खम्भे से उतरते हुए कर्मचारी ने बताया- होगा क्यों नहीं; टेंडर के लिए साहब का पैर दबाते-दबाते दूर की रिश्तेदारी खोज निकाली है। साहब अब इनके मौसा हो गए हैं। 

कर्मचारी से पहली बार सरकार बदल गई है कहने और आखिरी बार कहने की उनकी गर्जना में अंतर होता है। पहली बार कहते हैं, तो लगता है शायद बादल गरज रहे हों। अंतिम बार कहते हैं, तब बादलों का गरजना सुनिश्चित हो जाता है। उनका बालकनी में आकर कर्मचारियों से गरजकर बात करना अकारण नहीं है। कॉलोनी में अभी तक सभी लोग नहीं जान पाए हैं कि सरकार बदल गई है। ‘परफॉरमेंस’ वाली सरकार आ गई है।

सरकार बदलने की सूचना पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से देती आई हैं। सरकारी अस्पतालों में जाने वाले मरीज और उनके तीमारदार नहीं जानते कि सरकार बदल गई है, तो सरकार अस्पताल की इमारत को नीले रंग से रंगवा देती है। सरकारी अस्पताल जाने वाले समझ जाते हैं, सरकार बदल गई है। बसपा की सरकार आ गई है। रोडवेज बस से यात्रा करने वाले यात्री नहीं जानते कि सरकार बदल गई है, तो सरकार रोडवेज बसों को हरे और लाल रंग में रँगवा देती है। यात्री समझ जाते हैं, सरकार बदल गई है। सपा की सरकार आ गई है। सरकारी कर्मचारी और अधिकारी नहीं मानते कि सरकार बदल गई है, तो सरकार उनकी कुर्सी पर भगवा तौलिया रखवा देती है। कर्मचारी और अधिकारी मान जाते हैं, सरकार बदल गई है। भाजपा की सरकार आ गई है।

होश संभालने के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं देखा। अतीत को याद कर लें, कांग्रेस सरकार बदलने की सूचना कैसे देती थी।

एक दिन चाय की दुकान पर मोहल्ला प्रभारी मिले। अपनी तकिया कलाम मंडली के साथ कानून-व्यवस्था की आरती गा रहे थे। उनकी आरती सुन मैं सोच रहा था- एनकाउंटर में ठोक अपराध रोकने की मुख्यमंत्री की नीति के बाद भी अपराध का ग्राफ ऊपर चढ़ता जा रहा है। पुलिस पर प्रमोशन के लिए फर्जी मुठभेड़ों और बेगुनाहों को मारने का आरोप लग रहा है। पुलिस का अपराधीकरण बढ़ रहा है। ये कौन सी कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बता रहे हैं? 

बातचीत के दौरान जैसे ही उन्होंने ‘सरकार बदल गई है’ कहा, मैंने पूछा- पार्टी बदलती है, मुख्यमंत्री बदलते हैं; पर सरकार अपना चरित्र बदलने में बड़ी आनाकानी करती है।

-इसका कारण ये है कि जनता सहयोग नहीं करती। जनता सहयोग करे तो सब कुछ बदला जा सकता है।

-क़ानून-व्यवस्था भी सुधारी जा सकती है?

-बिल्कुल। किसी के घर में हथियारबंद डकैत घुसें तो घरवालों को डकैतों से कहना चाहिए- सुधर जाओ। सरकार बदल गई है। ये सुनते ही डकैत हथियार फेक भाग जाएंगे। किसी से रंगदारी माँगी जाए, तो रंगदारी माँगने वाले से कहना चाहिए- सुधर जाओ। सरकार बदल गई है। ये सुनते ही रंगदारी माँगने वाला अदालत में आत्मसमर्पण कर देगा। हत्या की नीयत से अपराधी गोली चलाने वाला हो, तो उससे कहना चाहिए- सुधर जाओ। सरकार बदल गई है। ये सुनते ही अपराधी सीधे जेल जाएगा। 14 साल कैद-ए-बामुशक्कत के बाद ही बाहर आएगा।

-सरकार बदल गई है कहने से बलात्कारियों का भी ह्रदय परिवर्तन हो जाएगा?

-बिल्कुल।

मैंने उनसे वादा किया कि अपराधियों को औकात में रखने वाले आपके फार्मूले से मैं जनता को जरूर परिचित कराऊँगा। वे खुश हुए। उन्होंने चाय वाले से कहा- भाई की चाय का पैसा मेरे खाते में लिख लिया करो।

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